इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह प्रतिपादित किया है कि लघु वाद न्यायालय जटिल एवं सद्भावपूर्वक उत्पन्न शीर्षक विवादों का अंतिम निर्णयन करने के लिए सक्षम नहीं हैं, तथा ऐसे विवादों का विचारण सक्षम दीवानी न्यायालय द्वारा ही किया जाना आवश्यक है।

यह निर्णय माननीय न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव द्वारा पारित किया गया, जिसमें वादी द्वारा दायर प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 25 के अंतर्गत पुनर्विलोकन याचिका स्वीकार की गई। उक्त याचिका, एटा स्थित लघु वाद न्यायालय द्वारा वादी के निष्कासन वाद को खारिज किए जाने के विरुद्ध दायर की गई थी।

वादी ने यह दावा किया कि वह विवादित परिसंपत्ति का विधिवत पंजीकृत पट्टा विलेख, जो मंदिर प्रबंधन द्वारा निष्पादित किया गया था, के आधार पर विधिक स्वामी/भूस्वामी है तथा प्रतिवादी-किरायेदार के विरुद्ध निष्कासन, बकाया किराया एवं हर्जाना वसूली की मांग की। तथापि, प्रतिवादी ने वादी के साथ भूस्वामी-किरायेदार संबंध को अस्वीकार करते हुए किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से स्वतंत्र स्वामित्व का दावा प्रस्तुत किया, जिससे स्वामित्व के परस्पर प्रतिस्पर्धी दावों की स्थिति उत्पन्न हुई।

प्रतिवादी का यह कथन था कि जब विचारण न्यायालय स्वयं यह निष्कर्ष दर्ज कर चुका था कि शीर्षक संबंधी विवाद गंभीर एवं सद्भावपूर्ण है, तब उसे अधिनियम की धारा 23 के अंतर्गत वादपत्र वापस कर देना चाहिए था, न कि वाद का गुण-दोष के आधार पर निस्तारण करना चाहिए था। प्रतिवादी द्वारा इस विधिक स्थिति का खंडन नहीं किया गया कि जटिल शीर्षक विवाद लघु वाद न्यायालय की अधिकारिता से परे होते हैं।

उच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 की धारा 23 ऐसे मामलों में लघु वाद न्यायालय के संक्षिप्त क्षेत्राधिकार को सीमित करती है, जहाँ वाद का निर्णय महत्वपूर्ण शीर्षक संबंधी प्रश्नों के निर्धारण पर निर्भर करता है। यद्यपि ऐसे न्यायालय सीमित उद्देश्य हेतु भूस्वामी-किरायेदार संबंध की स्थापना के लिए शीर्षक का आकस्मिक परीक्षण कर सकते हैं, तथापि वे जटिल स्वामित्व विवादों का अंतिम निर्णय नहीं कर सकते।

न्यायालय ने शमीम अख्तर बनाम इकबाल अहमद तथा बुधु मल बनाम महाबीर प्रसाद जैसे पूर्ववर्ती निर्णयों पर निर्भरता व्यक्त करते हुए यह अभिमत व्यक्त किया कि ऐसी परिस्थितियों में वाद को गुण-दोष के आधार पर खारिज करना क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि के समकक्ष है।

अतः उच्च न्यायालय ने दिनांक 30 अक्टूबर 2025 के विवादित निर्णय एवं डिक्री को निरस्त करते हुए लघु वाद न्यायालय को निर्देशित किया कि वह धारा 23, प्रांतीय लघु वाद न्यायालय अधिनियम, 1887 के अंतर्गत वादपत्र को सक्षम दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने हेतु वापस करे।

यह निर्णय इस सिद्धांत को पुनः स्थापित करता है कि जिन विवादों में शीर्षक से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न निहित हों, उनका निस्तारण नियमित दीवानी वाद के माध्यम से ही किया जाना चाहिए, न कि संक्षिप्त अधिकारिता के सीमित दायरे में।

वादविवरण:
वाद संख्या: S.C.C. पुनर्विलोकन संख्या 16/2026
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
याचिकाकर्ता: सुरेश शाह सिसोदिया
प्रतिवादी: जय प्रकाश यादव
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